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रूडी म्‍हारी राजस्‍थानी

               राजस्थानी भासा संसार री सिरैजोग भासावां मांय सूं एक है, इण में रत्ती भर रो ही फरक कोनी। इण रौ इतिहास ढाई हजार बरस जूनौ है अर इण रौ सबद कोस सैसूं लूंठौ है, जिण में दो लाख दस हजार सबद है जिका संसार रै किणी सबदकोस में नीं है। इण में अलेखूं मुहावरा नैं कहावतां है अर एक एक सबद रा अनेकूं पर्यायवाची सबद है, जित्ता संसार री किणी भी भासा में मिलणा अबखा है। आर्य भासावां में राजस्थानी रो मुकाबलो करण री खिमता किणी भासा में कोनी। असमिया, बंगला, उड़िया, मराठी आद भासावा मांय सूं संस्कृत रा सबदां नैं टाळ दिया जावै तो इण भासावां री गत देखणजोग व्है।

              मतलब इण भासावां रौ आप रौ न्यारौ इसौ कोई लूंठौ थंब-थळ कोनी कै वै आप रै पगां पर थिर रह सकै। आधुनिक काळ में इण भासावां में अथाग साहित्य रौ सिरजण तो व्हियौ है पण इण में इण भासावां री मौलिकता अर भासा री मठोठ निगै नीं आवै। इण भासावां रा सबदकोस भी इत्ता लूंठा नीं है कै ऐ आप रै खुद रै बूतै पर कोई सिरजण कर सकै। संस्कृत सबदां री बोळगत इण भासावां में है। भासावां री जणनी वैदिक भासा संस्कृत रै पुन परताप बिना तो कोई भी भासा खड़ी नीं हुय सकै। राजस्थानी भासा में भी संस्कृत रै तत्सम सबदां रौ प्रयोग व्है पण इण सूं राजस्थानी भासा री आप री निजू मठोठ कदैई कम नी व्है। राजस्थानी रै जूनै साहित्य सूं ले'र आज रै आधुनिक साहित्य रै सिरजण तकात राजस्थानी भासा आप री मूळ लीक पर चालती रैयी अर आप री मठोठ नीं छोडी।

              आ वीरां, सूरां, संतां अर १३ करोड़ जणखै री जींवती जागती मिसरी सी मीठी भासा है। इण री कविता रै एक छंद सूं खागां खड़क उठै। जुध रै वर्णन री कविता आज रै टेलिविजन रै लाइव प्रसारण नैं भी लारै बैठावै। एक बांनगी निजर है- तोपें तें तें धुधआळी धधक उठी धुंआआळी गोळी पर बरसे गोळी पण लोही सूं खेले होळी। कांठळ आयां ज्यूं काळी आभै छायी अंधियारी। बोल्यो गरणाटो गोळी रूकगी सूरज री उगियाळी। इण रै रसपाण सूं वीर बळती लाय में कूद पड़ै। इण री एक हाकल सूं बैरी आप री पूठ पाछी फोरले। रूप अर सिणगार रै गैणां सूं लड़ालूम आ एकदम आजाद न्यारी-निरवाळी आर्य भासा है।

                   

Mayar bhasha Rajasthani

 

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